सलोकु मः ३ ॥
सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥ सतिगुरु अपणा मनाइ लै रूपु चड़ी ता अगला दूजा नाही थाउ ॥ ऐसा सीगारु बणाइ तू मैला कदे न होवई अहिनिसि लागै भाउ ॥ नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥१॥ मः ३ ॥ लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥ वेसी सहु न पाईऐ करि करि वेस रही ॥ नानक तिनी सहु पाइआ जिनी गुर की सिख सुणी ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ इन बिधि कंत मिली ॥२॥ पउड़ी ॥ हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥ तेरा हुकमु न जापी केतड़ा सचे अलख अपारा ॥ इकना नो तू मेलि लैहि गुर सबदि बीचारा ॥ सचि रते से निरमले हउमै तजि विकारा ॥ जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलै सोई सचिआरा ॥२॥ {पन्ना 786}
अर्थ: हे सूहे वेश वालिए! अगर तू सदा-स्थिर (प्रभू का) नाम मान ले तो तू सोहाग-भाग वाली हो जाए। अपने गुरू को प्रसन्न कर ले, बड़ी (नाम-) रंगत चढ़ आएगी (पर इस रंगत के लिए गुरू के बिना) कोई और जगह नहीं है। (सो गुरू की शरण पड़ कर) ऐसा (सुंदर) श्रृंगार बना जो कभी मैला ना हो और दिन-रात तेरा प्यार (प्रभू से) बना रहे।
हे नानक! (इसके बिना) सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री के और क्या लक्षण हो सकते हैं? उसके अंदर सच्चा नाम हो, मुँह (पर नाम की) लाली हो और वह पति-प्रभू में जुड़ी रहे।1।
हे लोगो! मैं (निरी) सूहे वेश वाली (ही) हूँ, मैं (सिर्फ) सूहे कपड़े (ही) पहनती हूँ; पर (निरे) वेशों से पति (-प्रभू) नहीं मिलता, मैं भेस कर-कर के थक गई हूँ।
हे नानक! पति उनको (ही) मिलता है जिन्होंने सतिगुरू की शिक्षा सुनी है। (जब जीव-स्त्री इस अवस्था में पहुँच जाए कि) जो प्रभू को भाता है वही होता है, तो इस तरह वह प्रभू-पति को मिल जाती है।2।
उस प्रभू ने ये सृष्टि ये संसार अपने हुकम के अनुसार कई किस्मों का बनाया है।
हे सच्चे! हे अलख! और हे बेअंत प्रभू! ये समझ नहीं आती कि तेरा हुकम कितना (बलवान) है। कई जीवों को तू गुरू-शबद में जोड़ के अपने साथ मिला लेता है, वह अहंकार रूपी विकार त्याग के तेरे नाम में रंगे जाते हैं और पवित्र हो जाते हैं। हे प्रभू! जिसको तू मिलाता है वह तुझे मिलता है और वही सत्य का व्यापारी है।2।



